
हल्द्वानी: हल्द्वानी से नैनीताल तक, विकास की गाड़ी काग़ज़ों पर दौड़ रही है। सवाल यह नहीं कि किसके पास कितना बजट था, सवाल यह है कि किसने उसे सड़क, नाली, पुलिया और उम्मीद में बदला। जनपद नैनीताल की छह विधानसभा सीटों की विधायक निधि का हिसाब खोलिए तो राजनीति की एक दिलचस्प तस्वीर उभरती है जहाँ विपक्ष का एकमात्र विधायक खर्च में सबसे आगे है और सत्ताधारी पार्टी का एक विधायक कतार के आख़िर में।
कहते हैं सत्ता के साथ संसाधन चलते हैं, लेकिन यहाँ कहानी उलटी है। हल्द्वानी के विधायक सुमित हृदयेश कांग्रेस के इकलौते विधायक है जो खर्च की सूची में सबसे ऊपर हैं। वर्ष 2022-23 से 2025-26 के चार वर्षों में विकास कार्यों में खर्च करने के लिए मिले 1875 लाख रुपये में से उन्होंने 1779.19 लाख रुपये खर्च कर दिए। मतलब निधि काग़ज़ों में नहीं, ज़मीन पर उतारने की कोशिश। अब सत्ता की ओर देखिए। भाजपा के भीतर भी तस्वीर एक जैसी नहीं। लालकुआं के विधायक डॉ. मोहन सिंह बिष्ट खर्च के मामले में दूसरे नंबर पर हैं और अपनी पार्टी के विधायकों में पहले नम्बर पर। उनकी खासियत यह कि विधायक निधि में सबसे कम बकाया भी उन्हीं का है। यानी खर्च और अनुशासन दोनों साथ-साथ।
लेकिन इसी पार्टी में रामनगर के विधायक दीवान सिंह बिष्ट खर्च की दौड़ में सबसे पीछे रह गए। 1303.38 लाख रुपये खर्च और बकाया सबसे ज़्यादा, 571.62 लाख। यहाँ सवाल य़ह उठता है कि विकास रुका क्यों? फाइलें अटकीं या प्राथमिकताएं? अब बीच के नंबरों की बात करें तो यहाँ भी दिलचस्पी है। कालाढूंगी से बंशीधर भगत ने 1748.78 लाख खर्च किए और लगभग शीर्ष के आसपास पहुच गए। जबकि नैनीताल की विधायक सरिता आर्या का खर्च 1394.35 लाख रहा। वहीं भीमताल के विधायक राम सिंह केड़ा ने 1356.39 लाख खर्च किए हैं। यहां याद दिला दें कि वर्ष 2017 में मोदी लहर के बीच निर्दलीय जीतकर आए विधायक राम सिंह केड़ा अब भाजपा में हैं। अब जनपद नैनीताल की राजनीति का गणित भी याद कर लीजिए। यहां छह विधानसभा सीटें है रामनगर, कालाढूंगी, लालकुआं, हल्द्वानी, नैनीताल और भीमताल। पिछले दो विधानसभा चुनावों में हल्द्वानी को छोड़कर पाँचों पर सीटों पर भाजपा का कब्जा है। सत्ता का वर्चस्व है, पर खर्च का तमगा विपक्ष के पास है। तो असली सवाल क्या है? क्या विकास का पैमाना सिर्फ़ सत्ता से तय होता है? या फिर यह इस बात पर निर्भर करता है कि विधायक निधि को फाइल से निकालकर गली-मोहल्ले तक कौन पहुँचाता है? नैनीताल की यह रिपोर्ट हमें एक बात सिखाती है कि राजनीति में शोर बहुत है, पर असली कहानी अक्सर हिसाब-किताब में छुपी होती है। और जब हिसाब खुलता है, तो सत्ता और विपक्ष की लकीरें धुंधली हो जाती हैं।
