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देहरादून से एक खबर है, जो देखने में प्रशासनिक टकराव लगती है, लेकिन असल में देश की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक प्रक्रिया जनगणना से जुड़ी हुई है। सवाल यह नहीं है कि किसका अहं आहत हुआ, सवाल यह है कि जिम्मेदारी किसकी थी और निभाई किसने। देहरादून के जिलाधिकारी सविन बंसल एक बार फिर चर्चा में हैं। इस बार वजह उनके किसी कड़े आदेश से ज़्यादा, उनके ख़िलाफ़ की गई शिकायत है। शिकायत देहरादून कैंटोनमेंट बोर्ड क्लेमेंट टाउन की सीईओ अंकिता सिंह ने मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को भेजी है। आरोप गंभीर हैं मानसिक उत्पीड़न, अधिकार क्षेत्र में अतिक्रमण और जेंडर डिस्क्रिमिनेशन। लेकिन हर आरोप के पीछे एक संदर्भ होता है। और इस खबर का संदर्भ है भारत की आगामी जनगणना। भारत सरकार के गृह मंत्रालय ने जनगणना के अग्रिम चरण को लेकर जिलाधिकारियों को प्रमुख जनगणना अधिकारी नामित किया है। इसका मतलब साफ है क्षेत्र निर्धारण, अधिकारियों की नियुक्ति, विभागों के बीच समन्वय और समयबद्ध रिपोर्टिंग। इसी क्रम में 28 जनवरी 2026 को निदेशक जनगणना (गृह मंत्रालय) और जिला प्रशासन देहरादून की संयुक्त बैठक बुलाई गई। इस बैठक में कैंटोनमेंट बोर्ड गढ़ी और क्लेमेंट टाउन की सीईओ को विधिवत लिखित सूचना और फोन के ज़रिए आमंत्रित किया गया। लेकिन कुर्सियां खाली रहीं। निदेशक जनगणना ने नाराज़गी जताई। फिर 31 जनवरी को दोबारा बैठक रखी गई। इस बार भी न सिर्फ लिखित सूचना दी गई, बल्कि अपर जिलाधिकारी ने खुद फोन कर बैठक के महत्व को समझाया। फिर भी, दोनों छावनी परिषदों के अधिकारी बैठक में नहीं पहुंचे। इन बैठकों में अनुपस्थिति का सीधा असर पड़ा छावनी क्षेत्रों का क्षेत्र निर्धारण नहीं हो सका, जनगणना की शुरुआती कार्रवाई शुरू ही नहीं हो पाई। यह लापरवाही नहीं तो क्या है? निदेशक जनगणना, गृह मंत्रालय ने इसे गंभीर मानते हुए जनगणना अधिनियम, 1948 के तहत कार्रवाई की संस्तुति की। कानून की वही धाराएं, जिनमें एक महीने तक के कारावास का प्रावधान है। यहां यह याद रखना ज़रूरी है कि जनगणना किसी एक अधिकारी की नहीं, पूरे देश की ज़िम्मेदारी है। इसी बीच विवाद ने नया मोड़ लिया, जब डीएम सविन बंसल ने बैठक में अनुपस्थित रहने पर सीईओ के सरकारी वाहन की जांच/जब्ती के लिए आरटीओ टीम भेजी। सीईओ अंकिता सिंह ने इसे अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन और महिला अधिकारी के उत्पीड़न के तौर पर देखा। लेकिन जिला प्रशासन का पक्ष साफ है यह कार्रवाई इमरजेंसी पावर के तहत नहीं, बल्कि जनगणना से जुड़ी प्रशासनिक जवाबदेही सुनिश्चित करने के प्रयास के रूप में की गई। सवाल यह है कि अगर एक केंद्रीय स्वायत्त संस्था का अधिकारी जनगणना जैसी संवैधानिक प्रक्रिया से बार-बार दूरी बनाए, तो जवाबदेही तय कौन करेगा? यह मामला सिर्फ डीएम बनाम सीईओ नहीं है। यह सवाल है क्या जनगणना जैसी राष्ट्रीय प्रक्रिया में मेरा विभाग अलग है कहकर जिम्मेदारी से बचा जा सकता है? क्या बैठक में न जाना प्रशासनिक स्वतंत्रता है या प्रशासनिक लापरवाही? डीएम सविन बंसल के फैसलों पर बहस हो सकती है। होनी भी चाहिए। लेकिन इस पूरे प्रकरण में एक बात साफ है जिला प्रशासन ने जनगणना को प्राथमिकता दी, और कानून के दायरे में रहकर कार्रवाई की। लोकतंत्र में सवाल ज़रूरी हैं, लेकिन जवाबदेही उससे भी ज़्यादा।

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