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एसी दफ्तर बनाम जंगल की हकीकत: भीमताल में मौत और फाइलों में इनकार

भीमताल के भदयूनी गांव में एक युवक की मौत हुई है। लेकिन असली कहानी उस मौत की नहीं, उस प्रतिक्रिया की है जो इस मौत के बाद आई। जंगल में अधखाया शव मिलता है। ग्रामीण कहते हैं बाघ है। पिछले 20 दिनों में तीन घटनाएं हो चुकी हैं। डर साफ दिखता है। लेकिन दफ्तर से आवाज आती है यह वाइल्ड लाइफ का मामला नहीं है। यहीं से खबर शुरू होती है। वन विभाग के कंजरवेटर नीतिश मणि त्रिपाठी इस पूरे मामले में सवालों के केंद्र में हैं। आरोप है कि जब गांव में अफरा-तफरी है, लोग सड़कों पर हैं, जनप्रतिनिधि मौके पर हैं तब साहब एसी कमरे में बैठकर फोन पर जमीनी हकीकत समझ रहे हैं।
यह वही पुराना प्रशासनिक चश्मा हैजिससे जंगल भी फाइल जैसा दिखता है और मौत भी डेटा बन जाती है। उत्तराखंड सरकार की मीडिया सलाहकार समिति के उपाध्यक्ष ध्रुव रौतेला ने सीधा सवाल दागा अगर यह बाघ का हमला नहीं है, तो क्या यह मर्डर है?
यह सवाल व्यंग्य नहीं, एक सीधा आरोप है कि या तो आप सच्चाई से दूर हैं, या उसे स्वीकार करने से बच रहे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि बाघ की मौजूदगी की सूचना पहले ही दी गई थी। लेकिन कार्रवाई?
न गश्त बढ़ी, न पिंजरा लगा, न सुरक्षा के इंतजाम हुए। अब जब एक युवक की जान चली गई, तो बयान बदलने लगे। यह सिर्फ लापरवाही नहीं लगती यह संवेदनहीनता की पराकाष्ठा है।सोचिए, एक परिवार जिसने रातभर अपने बेटे को ढूंढा सुबह उसका अधखाया शव मिलता है और उसी वक्त कोई अधिकारी कहता है यह वाइल्डलाइफ का मामला नहीं है। यह बयान नहीं, जख्म पर नमक है। यह खबर बाघ की नहीं, बहाने की है। यह रिपोर्ट जंगल की नहीं, जिम्मेदारी से भागने की है। क्योंकि असली सवाल अब यह नहीं है कि बाघ था या नहीं। असली सवाल यह है कि अगर था तो तैयारी क्यों नहीं थी? और अगर नहीं था तो सच क्या है? भीमताल का गांव आज भी डरा हुआ है। लेकिन उस डर से बड़ा एक गुस्सा है जो पूछ रहा है
क्या हमारी जान की कीमत सिर्फ एक प्रेस नोट है? कुल मिलाकर जंगल में बाघ का होना प्राकृतिक है। लेकिन सिस्टम में अनदेखी का होना खतरनाक है। क्योंकि बाघ कभी-कभी मारता है लेकिन लापरवाही बार-बार।

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