
गौलापार में बस अड्डे की आहट से फिर चढ़े जमीनों के दाम, सरकारी फैसलों के बीच करोड़ों के निवेश का खेल; जमीनों की खरीद-फरोख्त पर निगरानी जरूरी
हल्द्वानी। सरकारी योजनाओं का ठिकाना बदलता है तो सिर्फ नक्शे नहीं बदलते, कई लोगों की उम्मीदें और निवेश के समीकरण भी बदल जाते हैं। हल्द्वानी के अंतरराज्यीय बस अड्डे (आईएसबीटी) की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। आठ साल में आईएसबीटी गौलापार से तीनपानी और फिर वापस गौलापार की ओर लौटता दिखाई दे रहा है। लेकिन इस सरकारी उधेड़बुन के बीच एक दिलचस्प पहलू जमीनों के कारोबार का भी है। आईएसबीटी के नाम पर कभी गौलापार में जमीनों के भाव आसमान छूने लगे थे। फिर बस अड्डे का ठिकाना बदला तो बिल्डरों और निवेशकों के चेहरे उतर गए। अब दोबारा गौलापार में आईएसबीटी बनने की चर्चा ने जमीनों के बाजार में फिर हलचल पैदा कर दी है।
दरअसल, जब गौलापार में अंतरराष्ट्रीय स्टेडियम के निर्माण के साथ ही आईएसबीटी बनने का रास्ता साफ हुआ था, तब इस पूरे क्षेत्र की जमीनों को भविष्य के बड़े निवेश के रूप में देखा जाने लगा। विकास की संभावनाओं को भांपते हुए बिल्डरों और निवेशकों ने यहां बड़े पैमाने पर जमीनें खरीदीं। जमीनों के दाम तेजी से बढ़ने लगे और गौलापार को भविष्य के बड़े कारोबारी केंद्र के रूप में प्रचारित किया जाने लगा। कई लोगों ने इसे आने वाले समय में मुनाफे का बड़ा अवसर माना।
लेकिन सरकारी फैसले ने अचानक पूरा गणित बदल दिया। वर्ष 2018 में गौलापार से आईएसबीटी हटाकर हल्द्वानी के तीनपानी क्षेत्र में बनाने की घोषणा हुई तो जमीनों के कारोबार से जुड़े लोगों की उम्मीदों को झटका लगा। जिस परियोजना के सहारे गौलापार में जमीनों की कीमतें चढ़ रही थीं, उसका केंद्र ही बदल गया। इसके बाद निवेशकों और बिल्डरों के सामने अपने निवेश के भविष्य को लेकर नए सवाल खड़े हो गए।
अब आठ साल बाद कहानी फिर करवट लेती दिख रही है। उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय के पास प्रस्तावित दूसरी जमीन पर पेड़ों के कटान और अन्य व्यावहारिक अड़चनों के चलते परिवहन विभाग की नजरें एक बार फिर गौलापार की पुरानी आठ हेक्टेयर वन भूमि पर टिक गई हैं। विभाग ने इस जमीन को दोबारा हासिल करने की तैयारी शुरू कर दी है। आईएसबीटी के गौलापार लौटने की खबर सामने आते ही एक बार फिर इस क्षेत्र की जमीनों को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं। जमीनों के भाव में उछाल की बात सामने आ रही है और बिल्डर व निवेशक भी यहां नए सिरे से निवेश की संभावनाएं तलाशने लगे हैं।
यानी सरकारी योजना के स्थान बदलने और फिर पुराने ठिकाने पर लौटने के बीच जमीनों के बाजार में भी उतार-चढ़ाव का दौर चलता रहा। सवाल यह है कि आखिर सरकारी परियोजनाओं की घोषणा और उनके स्थान में बदलाव का फायदा किसे मिलता है? क्या हर बार ऐसी घोषणाओं के बाद जमीनों के बाजार में सक्रिय लोग पहले से ही संभावनाओं का आकलन कर लेते हैं? और क्या आम जमीन खरीदार को इन बदलते सरकारी फैसलों की पूरी जानकारी मिल पाती है?
यहां जमीनों की खरीद-फरोख्त में पारदर्शिता का सवाल भी बेहद अहम हो जाता है। आईएसबीटी के संभावित स्थान को लेकर अभी अंतिम निर्णय और सभी औपचारिकताएं पूरी होना बाकी हैं। ऐसे में परियोजना के नाम पर जमीनों के भाव बढ़ाने, भविष्य के विकास का हवाला देकर निवेश के लिए माहौल बनाने और आम खरीदारों को भ्रमित करने की आशंकाओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। प्रशासन और संबंधित विभागों को भी जमीनों के लेनदेन पर नजर रखने तथा किसी भी तरह की भ्रामक जानकारी और अनियमितता को रोकने के लिए सतर्क रहने की जरूरत है।
आठ साल पुरानी सरकारी कहानी पर लौटें तो गौलापार की आठ हेक्टेयर वन भूमि के लिए परिवहन विभाग ने वन विभाग की तमाम शर्तें पूरी की थीं। क्षतिपूरक वनीकरण के लिए बागेश्वर में दोगुनी यानी 16 हेक्टेयर भूमि उपलब्ध कराई गई। पौधरोपण और अगले सात से दस वर्षों तक उसके रखरखाव के लिए 26,33,548 रुपये जमा किए गए। प्रस्तावित भूमि के आसपास पौधरोपण और रखरखाव के लिए करीब सात लाख रुपये भी दिए गए। इसके अलावा आठ हेक्टेयर वन भूमि की नेट प्रेजेंट वैल्यू (एनपीवी) के रूप में 83 लाख रुपये से अधिक की धनराशि जमा कराई गई थी। इसके बावजूद सितंबर 2020 में परिवहन विभाग ने यह जमीन वन विभाग को वापस सौंप दी। वन विभाग ने भी दोबारा कब्जा ले लिया।
हैरानी यह है कि जमीन लौटाने के बाद विभाग ने इसके एवज में जमा कराई गई धनराशि की वापसी के लिए भी कोई मांग नहीं की। अब उसी जमीन को दोबारा हासिल करने की तैयारी है। ऐसे में पुराने फैसले, सरकारी धन के खर्च और जमीन लौटाने के कारणों का हिसाब भी सामने आना चाहिए।
उप परिवहन आयुक्त सुनील शर्मा के अनुसार, आईएसबीटी के लिए दूसरी जगह जमीन की संभावनाएं तलाशी जा रही थीं, लेकिन वहां बड़ी संख्या में पेड़ आ रहे हैं। इसके अलावा भी कई ऐसे पहलू हैं, जो उस भूमि को योजना के लिहाज से कम उपयुक्त बनाते हैं। उन्होंने बताया कि अब गौलापार में पहले प्रस्तावित आठ हेक्टेयर वन भूमि को दोबारा प्राप्त करने के प्रयास किए जाएंगे। इस संबंध में सचिव परिवहन की ओर से भी निर्देश दिए गए हैं।
फिलहाल आईएसबीटी कहां बनेगा, इसका अंतिम फैसला होना बाकी है। लेकिन इस पूरी कवायद ने एक बड़ा सवाल जरूर खड़ा कर दिया है। सरकारी योजनाओं के बदलते ठिकानों के बीच जमीनों के बाजार में किसका फायदा और किसका नुकसान हो रहा है? विकास परियोजनाएं जनता की सुविधा के लिए बनती हैं, न कि जमीनों के कारोबार में बैठे लोगों के मुनाफे का जरिया बनने के लिए। इसलिए गौलापार में आईएसबीटी की वापसी से पहले जमीनों की खरीद-फरोख्त, कीमतों में अचानक आ रहे उछाल और निवेश के नाम पर किए जा रहे दावों की पारदर्शी निगरानी जरूरी है। वरना बस अड्डा बनने से पहले ही जमीनों का बाजार एक बार फिर अपनी मंजिल पर पहुंच सकता है।


